जीवन की नाव

एक संत थे | उनके कई शिष्य थे जो उनके पास रहकर अध्ययन किया करते थे | एक दिन एक महिला संत के पास रोती हुए आयी और उनसे विनती करते हुए कहने लगी की महाराज मेरे साथ बड़ी विकट परिस्थिति है | मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूँ इसलिए मेरे पास रहने का कोई भी निश्चित ठिकाना नहीं है |मैं बहुत ही अशांत और दुखी हूँ | कृपया मेरे मन को शांत करें |

इस पर संत बोले हर किसी को विरासत में पुश्तेनी जायदाद नहीं मिलती है सो ऐसे में उसे अपना मकान बनाने के लिए नेकी से धन का अर्जन करना होता है |तब आप का मकान बन जाएगी और आपको मानसिक शांति भी मिल जाएगी | महिला वंहा से चली गयी तो एक शिष्य जो है वो गुरु से सवाल करता है कि गुरूजी सुख तो समझ में आता है पर दुःख क्यों है | यह समझ में नहीं आता |

इस पर गुरु ने कहा हम शाम में नदी के पार जायेंगे तो मैं वंहा तुम्हे इस प्रश्न का उत्तर दूंगा तो शिष्य संतुष्ट हो गया और शाम को गुरु अपने शिष्यों के साथ जब नदी में होते है तो नदी के बीच में जाकर वो पतवार को हाथ में ले लेते है और केवल एक ही चप्पू से नाव चलाने लगे तो नाव गोल गोल घूमने लगी इस पर शिष्य बोले कि गुरूजी अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाएंगे तो यही होगा हम कभी किनारे पर नहीं पहुचेंगे और गोल गोल घूमते रहेंगे | तो गुरु बोले यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी है अगर हम सभी लोगो की जिन्दगी में हमेशा सुख ही होगा तो हम सुख के महत्व को ही भूल जायेंगे क्योंकि हम उसी के आदी होंगे जबकि दुखमय समय देखने के बाद जीवन में सुख का महत्व बढ़ जाता है और मनुष्य सुख को पाने के लिए और भी मनोयोग से पुरुषार्थ करता है |

जीवन में यदि दुःख ही नहीं हो आदमी का जीवन उसी नाव की तरह होता है जिस तरह हमारी नाव की हालत है इसलिए जिन्दगी को सम्पूर्ण तरीके में सुख और दुःख के साथ जीना होता है | दुखमय समय में हर मान लेना सही नहीं है |

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