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स्कूल की दोस्ती और जीवन के वो सुनहरे दिन

भाग 2 – स्कूल की दोस्ती और जीवन के वो सुनहरे दिन

लेखक: अपना बचपन टीम | अपडेट: नवम्बर 2025

स्कूल की दोस्ती

परिचय – वो दिन जो कभी लौटकर नहीं आए

क्या आपको याद है जब ज़िंदगी इतनी आसान थी कि होमवर्क पूरा करना ही सबसे बड़ा डर लगता था?
वो सुबह-सुबह की स्कूल बस की हॉर्न, वो हड़बड़ी में पहना गया यूनिफॉर्म, और वो
प्यारे दोस्त जिनके बिना एक भी दिन अधूरा लगता था।
“स्कूल की दोस्ती” — शायद यही वो रिश्ता है जो वक्त के साथ फीका नहीं पड़ता,
बल्कि उम्र के हर पड़ाव पर दिल के किसी कोने में जिंदा रहता है।

पहली मुलाकात – जब दोस्ती ने जन्म लिया

पहली मुलाकात

क्लास थ्री का वो पहला दिन… नई किताबें, नए बैग की खुशबू, और एक अनजान चेहरा बेंच के बगल में।
“तुम्हारा नाम क्या है?” — उस एक सवाल ने एक ऐसी दोस्ती की नींव रख दी जो आज भी याद है।
recess में टिफिन शेयर करना, पेंसिल बदलना, और होमवर्क न होने पर एक-दूसरे की मदद करना —
यही तो थे वो स्कूल की दोस्ती के सुनहरे पल

शरारतें जो आज भी मुस्कान बन जाती हैं

याद है जब टीचर बोर्ड की ओर मुड़ी होती थीं, और पीछे से चॉक उड़ते थे? या वो दिन जब
पूरी क्लास “मिलकर” एक प्रैंक करती थी — और पकड़े जाने पर सभी हँसते-हँसते रो पड़ते थे!
वो डेस्क पर खुदे नाम, वो डायरी में बने छोटे दिल,
और वो टाइम टेबल के पीछे छिपे “सीक्रेट मैसेज” आज भी दिल को गुदगुदा देते हैं।

शरारती पल

मासूम वादे और सच्ची भावनाएँ

“हम हमेशा साथ रहेंगे” — ये वो वादा था जो हर स्कूल की आखिरी बेंच पर लिया जाता था।
न उम्र की समझ थी, न दूरी का डर, बस एक भरोसा था कि दोस्त कभी नहीं बिछड़ेंगे।
पर वक्त का पहिया घूमता गया — कॉलेज, करियर, शहर, ज़िम्मेदारियाँ…
और वो दोस्त जिनके बिना जीना मुश्किल लगता था, अब बस यादों में रह गए।

टीचर – जो हमारी ज़िंदगी के पहले गाइड बने

टीचर और बच्चे

स्कूल की दोस्ती की बात हो और टीचर की चर्चा न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?
वो डाँट जो प्यार में बदल जाती थी, वो तारीफ जो आत्मविश्वास बन जाती थी,
और वो “गुड” या “वेल डन” की स्टैंप जिसने हमें उड़ान दी।
स्कूल के टीचर्स ने न सिर्फ हमें पढ़ाया, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाया।

वो लंच ब्रेक जो एक पर्व था

घंटी बजते ही जैसे युद्ध जीत लिया हो — “लंच टाइम!”
सब अपने-अपने टिफिन निकालते, और वो खुशबू पूरे क्लासरूम में फैल जाती।
किसी के घर के आलू परांठे, किसी के पास मैगी, और किसी के पास मम्मी का बनाया राजमा चावल।
उस लंच की मिठास, उन बातों की गर्माहट आज भी दिल को सुकून देती है।

लंच ब्रेक

एग्जाम्स, रिपोर्ट कार्ड और वो रेस

एग्जाम्स

एग्जाम का नाम सुनते ही डर लगता था, पर रिजल्ट के दिन की उत्सुकता भी वही होती थी।
“पहले कौन आएगा?” “किसे टीचर की तारीफ मिलेगी?” — यह सब एक छोटी सी प्रतियोगिता थी,
जो आज बड़ी यादों में बदल गई।
असल में, स्कूल हमें सिखा रहा था कि जीत-हार ज़िंदगी का हिस्सा है,
लेकिन कोशिश कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

फेयरवेल – विदाई में भी थी मोहब्बत

वो आखिरी दिन, जब यूनिफॉर्म पर ऑटोग्राफ लिए जाते थे।
“डोंट फॉरगेट मी”, “बेस्ट फ्रेंड्स फॉरएवर”, और “मिस यू” लिखते हुए आँखें नम हो जाती थीं।
उस दिन एहसास हुआ कि दोस्ती सिर्फ साथ बिताए वक्त का नाम नहीं,
बल्कि उन यादों का संगम है जो उम्रभर दिल में रहती हैं।

फेयरवेल

आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं…

जब आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम थक जाते हैं,
तो कहीं न कहीं अंदर का बच्चा उन दिनों को ढूँढने लगता है —
वो मासूम मुस्कानें, वो अनजाने सपने, और वो दोस्ती जो बिना मतलब की थी पर सबसे सच्ची थी।

शायद यही वजह है कि “Apna Bachpan” जैसे शब्द सुनते ही आँखों में चमक और होंठों पर मुस्कान आ जाती है।

📌 निष्कर्ष:
बचपन की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वो बीतने के बाद भी हमारे भीतर ज़िंदा रहता है।
स्कूल की दोस्ती, वो नोकझोंक, और वो छोटी खुशियाँ हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि
सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।भाग 3 में पढ़िए – यादों का सफर: कॉलेज और नई शुरुआत।

– Apna Bachpan ✨

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